उसकी हालत देख मैंने रागिनी की तरफ़ आँख मारी और कहा- सानिया बेटा, अब जरा तुम भी मेरा चूसो, अच्छा लगेगा। वो काँपते आवाज में बोली- नहीं चाचू, अब कुछ नहीं ! अब बस आप घुसा दो मेरे भीतर ! अब बर्दाश्त नहीं होगा, प्लीज. . . !
मैंने उसको छेड़ा- क्या घुसा दूँ, जरा ठीक से बोलो ना। रागिनी मेरे बदमाशी पर हँस दी, बोली- अंकल, क्यों दीदी को तड़पा रहे हो, कर दो जल्दी।