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जय भी उठ चुका था और लेटा हुआ अपनी बैहन को और अपनी मा को देख राहा था जो दर्वाज़े पर खडी थी. “जय उठो यहां से और अपना समान पैक करो, अब यहां पर हमारी ज़रूरत नही है,” रिया ने अपनी मम्मी की ओर देखते हुए काहा. “हम यहां से कहीं दूर जाकर अपनी ज़िंदगी नये सिरे से शुरू करेंगे. ”

“मैं क्या कर सकती थी? उनकी मा रोते हुए बोली, “तुम्हारे पिता ने कभी इस घर को अपना घर नही समझा, हमेशा एक अजनबी की तरह रहे वो घर मे.

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