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इतने में अब्दुल हिसाब करता हुआ बोला,”खेल खत्म हुआ. . . देखो. . . आपने मुझे पांच हज़ार दिये थे. . . इसमें से तीन हज़ार बानो के हुए. . . और ये दो हज़ार आपके वापस !” रफ़ीक ने पैसे लेकर मुझे दे दिये. . . “नहीं ये बानो के हैं. . . इसका दीदार हुआ. . . मेरा भाग्य जागा. . . !” मैंने पांच हज़ार लिये और पजामे की जेब में डाले।

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