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मैं मन ही मन खुश होने लगा कि मैं तो इन्हें ही कहीं भेजने की फिराक में था और ये खुद ही कहने लगे। मैंने मौका न गंवाते हुये उन्हें पचास रूपये देकर समोसे लेने भेज दिया और कहा- देखो, आराम से आना। कहीं जल्दी के चक्कर में समोसे मत खराब कर देना। ठीक है ! कह कर दोनों चल दिये। समोसे की दुकान गाँव से बाहर बाजार की ओर थी और उन्हे वहाँ से समोसे लेकर आने तक कम से कम डेढ़ घंटा लगना था।

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