उसके इस तरह बैठने से उसकी, घुटनो से उपर तक की जांघे और दीखने लगती थी। “अरे नही रे, रहने दे मेरी तो आदत पड गई है गरमी बरदाश्त करने की। ”
“क्यों बरदाश्त करती है ?, गरमी दिमाग पर चढ जायेगी। जा बाहर घुम के आ जा। ठीक हो जायेगा। ”
“जाने दे तु अपना काम कर। ये गरमी ऐसे नही शान्त होने वाली। तेरा बापु अगर समझदार होता तो गरमी लगती ही नही।