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झाडियों तक की दस कदम की ये दुरी, मैने मां के पिछे-पिछे चलते हुए उसके गोल-मटोल गदराये हुए चुतडों पर नजरे गडाये हुए तय की। उसके चलने का अंदाज इतना मदहोश कर देने वाला था। आज मेरे देखने का अंदाज भी बदला हुआ था। शायद इसलिये मुझे उसके चलने का अंदाज गजब का लग रहा था। चलते वक्त उसके दोनो चुतड बडे नशिले अंदाज में हिल रहे थे, और उसकी साडी उसके दोनो चुतडों के बीच में फंस गई थी, जिसको उसने अपने हाथ पिछे ले जा कर निकाला।

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