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इसीलिए प्रदीप भैया मेरी अविकसित चूचियों की तरफ बड़े गौर से देख रहे थे। खैर मैंने सबको चाय एवं नाश्ता दिया। प्रदीप भैया चाय पीते हुए बोले- यार रश्मि, तुम चाय बहुत बढ़िया बनाती हो !

इस पर मम्मी बोली- यह खाना भी बहुत अछा बनाती है ! आज तुम रश्मि के हाथ का बना खाना खा कर ही जाना. . . !

बीच में विशाल भैया बोले- हाँ यार ! चलो मुर्गा ले कर आते हैं ! बहुत दिनों से घर का बना मुर्गा नहीं खाया है।

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