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रूपा ने उसकी बैचेनी को देखते हुये अपने हाथों में कविता की दोनों चूंचियां भर ली। “मेरी कविता, अभी तो ये ले . . . फिर समय आने दे. . . आशू भी मिल जायेगा. . . !”

कविता सिसक उठी और रूपा से लिपट गई। रूपा ने भी मौके का पूरा फ़ायदा उठाया और अपनी एक चूंची उसके मुँह से रगड़ दी। कविता ने भी रूपा को पटाना उचित समझा और उसके ब्लाऊज को ऊपर खींच कर उसकी चूंची को अपने मुँह में भर लिया।

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