“कहां थी तू अब तक रे . . . क्या मस्त हो रही है . . . ” विनय नशे में बोला। मेरी चूत दबा कर कर मसलता रहा . . . पर ये ५०० रुपये का नशा भी साथ था . . . उसकी इच्छा मुझे पूरी जो करनी थी। मेरे सारे कपड़े एक एक कर उतरते जा रहे थे। हर बार मैं जानकर नाकाम विरोध करती . . . !
अन्तत: मैं वस्त्रहीन हो गई। मेरी चूंचियाँ बाहर छलक पड़ी .