शाम के साढ़े छह बज रहे थे। सर्दी में दिन जल्दी ढलता है, अँधेरा हो चुका था। मैं बाग़, जो कि बेरी का बाग़ है, वहाँ चल निकला। रास्ते से मैंने दो पैकेट कंडोम खरीद लिए, वहीं जा खड़ा हुआ जहाँ अक्सर मैं आता था पहले !
तभी एक साइकिल वाला बाग़ में आया, वो पुताई का काम करने वाला था और काम से निकल वहाँ सिगरट पीने आया था।