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मैं आंखे फ़ाड़े उन्हें देखती रही। उनका चुदाई का कार्यक्रम समाप्त होने पर मैं भारी कदमों से अपने कमरे में लौट आई। मन में वासना की ज्वाला भड़क रही थी। रात को तो जैसे तैसे मैंने चूत में अंगुली डाल कर अपना रस निकाल लिया, पर दिल की आग अभी बुझी नहीं थी। जमाना कितना बदल गया है, मेरे पति तो लाईट बन्द करके अंधेरे में मेरा पेटीकोट ऊपर उठा कर अपना लण्ड बाहर निकाल कर बस चोद दिया करते थे।

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