महेश को अपने पुरुषत्व का एहसास 18 साल कि उम्र से होने लगा था. लड़कियों के वक्ष और नितंब उसे उत्तेजित करते. बूबे और गांड, यह शब्द रात को उसे बहुत परेशान करते. उसके स्कूल कि लडकियां उसके सपनों में अक्सर नंगी होकर उसकी बाहों में आ जाती थी. मित्रों ने उसे मुठ मरने का ज्ञान दे दिया था. लड़कियों के बूबे और गांड निहारना और उनकी प्रशंसा करना उनका पसंदीदा टाइमपास था!
कई बार उसके दोस्तों ने उसे किसी लड़की पर धकेल दिया था जिससे उनके बूबे दबाने का सुखद अनुभव भी उसे मिल चूका था.