पर भाभी जैसे कुछ समझने को तैयार ही नही थी. मे
समझ नही पा रहा था की आख़िर वो चाहती क्या हैं. उन दीनो गर्मी के दिन थे. सबकी हालत गर्मी से खराब थी. भाभी
रात को कम से कम कप्रों मे सोया करती थी. मेरी आख रात को खुल
जाती तो मे आखें फाड़-फाड़ कर उनका जिस्म देखता रहता था. 1-2 बार
उनकी नींद भी खुल गयी उन्होने देखा तो मे फॉरन ऐसे टाय्लेट की
तरफ चल देता जैसे अभी उठा हौं.