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मैंने अपनी चादर और पानी की बोतल बगल में सीट पर रख दी. और थोड़ा अनिल से सट कर बैठ गयी. मेरे और अनिल की टांगे आपस में रगड़ खा रही थी. उसकी जांघों का स्पर्श मेरी जांघों पर हो रहा था. मैं अब जान कर बस के मुड़ने पर उस पर गिर गिर जाती थी. और उसकी जंघे पकड़ कर सीधी हो जाती थी. इतने में बस की लाइट जल गयी. मैंने पीछे मुड कर देखा तो थोड़े से लोग सीट पर बैठे झपकियाँ ले रहे थे.

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