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. . आपका दोस्त है. . . !”

रूपा कविता के कमरे में आ गई थी। दोनों सहेलियाँ कुछ गुपचुप बाते कर रही थी। “मै सोने जा रहा हूँ. . . हम दोनों ने खाना बाहर खा लिया है. . . रूपा तुम भी खा लेना !”

मौसा जी अपने कमरे में जाकर बत्ती बंद करके लेट गये। रूपा भी मौसा जी के पीछे चली गई। कविता ने भी अपने रात को सोने वाले कपड़े पहन लिये या यूँ कहे कि बस एक सामने से खुला हुआ गाऊन डाल लिया और बिस्तर पर लेट गई।

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