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“नहीं, दीदी, बरसात में डर लगता है. . . ”

“अरे पानी से क्या डरना, मजा आयेगा. ” मैंने उसे देख कर उसे लालच दिया। कुछ ही पलों में बूंदा-बांदी चालू हो गई। मैंने समेटे हुए कपड़े सीढ़ियों पर ही डाल दिए और फिर से बाहर आ गई। मोटी मोटी बून्दें गिर रही थी। हवा मेरे पेटीकोट में घुस कर मुझे रोमांचित कर रही थी।

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