उसके धक्के बढ़ने लगे. मैं बोलती रही “हाय रे . . . मत करो . . . . लग रही है . . . . हट जाओ न संजय . . . ”
“आह . . . आह ह . . . मेरी रानी . . . . क्या चिकनी गांड है . . . . . . आ अह ह्ह्ह मजा आ रहा है . . . . . . . ”
उसके तेज होते धक्को से मुझे दिल में संतोष मिल रहा था. मन आनंद से भर उठा था. मैं खुश थी कि आज मेरी गांड को लंड मिल गया.