. परेशां थी . . ख़ुद से या उस से पता नहीं . . !!
बिस्तर पर उठ के बैठी . . तो देखा कि . . खिड़की से आती चाँद कि चंचल चांदनी परदे से छन छन के उसके चेहरे पे पड़ रही है . . उसके रेशमी धागों से बाल उसकी आँखों पे थे . . मैंने खिड़की के पास पड़ी कुर्सी उठाई और उसके चेहरे के ठीक आगे कुर्सी लगा के बैठे बैठे उसे निहारने लगी .