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. मैंने खोलने से पहले अंदर से पूछा . . वो सर थे . . . मैंने दरवाजा खोला . . और सर अंदर आये मैंने सर को बैठने के लिए कुर्सी दी . . . सर वरुण की तरफ़ देख के बोले . . इसे क्या हुआ . . मैंने कहा सर . . इसे कुछ हो भी नहीं सकता . . कुम्भकरण की इस छटी पुश्त को कहाँ से उठा के लाये हो . . . जब से आया है सो ही रहा है .

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