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कभी कभी अंगुली अन्दर डाल कर चूत घिस लेती थी . . . । मेरी सांसें और धडकन तेज हो चली थी। अचानक मैंने समय देखा तो विनय का लंच पर आने का समय हो गया था। मैंने टीवी बन्द कर दिया। अपने आप को संयत किया और अपने कपड़े ठीक कर लिये और डायनिंग टेबल ठीक करने लगी। मेरी नजरें अब बदल गई थी। मर्द के नाम पर बस विनय ही था जिसे मैं रोज देखती थी।

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