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मुझे पता था कि रमेश अकेला पा कर कुछ तो करेगा ही। मैने भी आज दिल मजबूत कर लिया। मैने भी अपना हाथ नही छुड़ाया। मैने पीछे मुड़ कर उसे देखा … वो एकटक मुझे निहार रहा था। मैने शरम से अपना सर झुका लिया। हां…… पर हाथ नहीं छुड़ाया। मैने मुस्करा कर तिरछी निगाहों से उसे देखा। रमेश ने तीर छोड़ा -“मेडम… हंसी तो फंसी ……”

“मैं कहां फंसी …… फ़से तो तुम हो…” मैने भी तीर छोड़ा।

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