. . थोड़ा और पास आकर मैं बोला। क्या??? वो परेशान थी। मेरा रूमाल ले लो, इसी से काम चला लो. . . अँधेरे में मैं रूमाल हाथ में लिए उसके पास पहुँच गया। छी. . . . वो पेड़ के पीछे जा कर बोली. . . ऐसे भी कोई ?!?
तो फिर बैठी रहो रात भर यहाँ ! या ऐसे ही कपड़े पहन लो. . . मैं चला !
मैं मुड़ा ही था कि वो बोल पड़ी- अरे सुनो तो.