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उसी छत पर भाभी के कमरे की एक मध्यम आकार की खिड़की थी जिस पर गर्मी से बचाव के लिये कूलर लगा कर रखा था। चूंकि अभी गर्मी के दिन नहीं थे इसलिये कूलर का उपयोग नहीं होता था और बंद ही रहता था। मैने अपने खाली समय में छत में जा कर उस कूलर के पिछले हिस्से से उसमें लगी खस को काफ़ी कुछ निकाल दिया था और एक जगह से छेद जैसा बना दिया था, कूलर के उसी छेद से मैं भाभी के कमरे की हर चीज को असानी से देख सकता था।

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