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प्रगति को एक आजादी सी महसूस हो रही थी और उसका बरसों से भरा हुआ मन हल्का हो रहा था। कहानी ख़त्म होते होते प्रगति यकायक खड़ी हो गई और शेखर के सीने से लिपट गई और फिर से रोने लगी मानो उसे यह सब बताने की ग्लानि हो रही थी। शेखर ने उसे सीने से लगाये रखा और पीठ सहलाते हुए उसको सांत्वना देने लगा। प्रगति को एक प्यार से बात करने वाले मर्द का स्पर्श अच्छा लग रहा था और वह शेखर को जोर से पकड़ कर लिपट गई।

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