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मैं झड़ चुका था और माँ भी. . . . तो माँ ने कहा- रुको, अब थोड़ा आराम कर लो बेटा !

मैंने कहा- हाँ माँ ! मैं भी बहुत थक गया हूँ. . . . तो वो बोली- चल तू यहीं रुक ! मैं तेरे लिए दूध लाती हूँ . . . . . माँ जैसे ही उठी दूध लाने के लिये, मैंने फिर से गोदी में खींच लिया और उनकी चूचियों को अपने मुख से दबा लिया और चूसने लगा और कहा- मेरा पैष्टिक दूध तो यह रहा माँ ! तुम तो मुझे बचपन में यही दूध पिलाती थी ना !

तो वो बोली- अरे ! तू नहीं सुधरेगा ! थोड़ी देर भी नहीं इंतज़ार कर सकता ?

मैंने कहा- माँ, ऐसा मौका फिर कहाँ मिलेगा? आज के बाद पता नहीं कब मौका मिलेगा !

और मैंने दूध मुंह में भर लिए और मां गुदगुदी के मारे सिसकारियाँ भरने लगी।

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