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मैं घबराकर अनजान बनती बोली, “कैसा मज़ा पापा” “बेटी यहाँ कोई आया था” नही पापा यहाँ तू कोई नही आया था. “तू फिर तुम्हारी छूट मैं यह गढ़ा रस कैसा” मुझे क्या पता पापा जब आप मेरचूचियाँ मसल रहे थे तब कुच्छगिरा था शायद. मैं बहाना बनती बोली. “लगता है तुम्हारी छूट ने एक पानी छ्छोड़ दिया है. लो टवल से सॉफ कर लो.

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