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. . . . . उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़ जन्नत !. . . . . . . स्सपी तजेश्वरी राणा अपनी हवलदार कोकिला की गांड सूंघ के मदहोश हो रही थी. लंबी -लंबी साँसें ले के मानो वोह कोकिला की गांड की महक हमेशा के लिए अपने जेहन मे सेहेज के रख लेना चाहतीं थी . जी भर के सूंघने के बाद जेलर तेजेश्वरी ने अपनी जीभ बहर निकली और उसे कोकिला की गांड के मुहाने से चिपका दिया.

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