”
“हां, तुझे भी तो गरमी लग रही होगी मां ? जा तु भी बाहर घुम कर आ जा। थोडी गरमी शांत हो जायेगी। ”
और उसके हाथ से ईस्त्री ले लेता। पर वो बाहर नही जाती और वहीं पर एक तरफ मोढे पर बैठ जाती। अपने पैर घुटनो के पास से मोड कर और अपने पेटिकोट को घुटनो तक उठा के बीच में समेट लेती। मां जब भी इस तरीके से बैठती थी तो मेरा ईस्त्री करना मुश्कील हो जाता था।