पर कविता अभी गाण्ड नहीं मरवाना चाह रही थी। उसे तो बस चुदना था, सो वो बल खा कर पलट गई और लण्ड गाण्ड से निकल गया। अब कविता मौसा जी के नीचे थी और सीधी हो चुकी थी। मौसा जी ने भी उसे आराम से पलट जाने दिया और उसके ऊपर चढ़ गये। “हाय मौसा जी, प्लीज, मत करो, मुझे लाज आती है. . . !”
“बस ऐसे ही मस्ती करेंगे.