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वो अपनी जगह से उठा और तालाब के किनारे पर आकर उस पत्थर को पानी के बीचों बीच फ़ैंक दिया. पत्थर के फ़ैंकते ही पानी जोरों से चारों तरफ़ उछला और वो पत्थर तालाब की गैहराईयों में समाता चला गया. राज चुपचाप् सोच राहा था की ना जाने कितने ही ऐसे पन्ने इस तालाब की गैहराईयों में दफ़न पडे हैं. वैसे तो पानी का एक कत्रा उन पर लिखी लकीरों को मिटाने के लिये काफ़ी है पर अगर शब्द् सिर्फ़ धुन्दले पड गये तो वो शायद फिर भी पढे जायें.

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